Home Sliderखबरेदेशनई दिल्ली

पेट्रोल डीजल का टैंक डुबाएगा मोदी का ताज ?

नई दिल्ली (ईएमएस) । विपक्षी दलों की एकता से इतर केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी, को जो बात सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। वह है पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतें। पेट्रोल के दामों पर सरकारों का नियंत्रण सीमित ही रहता है, केन्द्र एवं राज्य सरकारों की आय का प्रमुख जरिया पेट्रोल-डीजल पर लगाया गया टैक्स एक्साइज ड्यूटी वगैरह है, मध्यमवर्ग पेट्रोल की कीमत से किसा डीजल की बढी हुई कीमतों से त्राहि-त्राहि कर रहा है, उसके घरेलू बजट की कमर टूट चुकी है, उधर सरकार भी असहाय है।

कर्नाटक चुनाव के कारण 19 दिन तक तेल की कीमतें नहीं बढ़ाई गई। उसके बाद तेल के दाम आसमान छूने लगे। दिल्ली में पेट्रोल 76 रुपए 24 पैसे प्रति लीटर बिक रहा है और डीजल के दाम भी 67 रुपए 57 पैसे पहुंच चुके हैं। यह कीमत सोमवार 21 मई की है। इसके और बढ़ने की संभावना है। सरकार के पास विकल्प सीमित हैं, यदि पेट्रोल के दामों में कटौती करने का प्रस्ताव आया तो एक्साइज ड्यूटी और दूसरे कर घटाने पड़ेंगे। राज्य सरकारें जिनमें से अधिकांश भाजपा अथवा एनडीए शासित हैं, टैक्स में कटौती करने के पक्ष में नहीं हैं। इससे राज्य सरकारों की अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है।

ऐसे में सरकार के समक्ष एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति पैदा हो चुकी है। सरकार का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। क्योंकि ओपेक देशों ने उत्पादन घटा दिया है। आयात बिल भी 50 अरब डालर बढ़ सकता है, जिसका असर देश के वित्तीय घाटे पर पड़ेगा। कहीं ना कहीं यह आर्थिक तरक्की पर भी दुष्प्रभाव भी डालेगा।

जिस समय नरेंद्र मोदी सत्तासीन हुए थे, विश्व के बाजार में तेल की कीमतें गिर रही थी। उस समय नरेंद्र मोदी ने अपनी किस्मत की सराहना करते हुए कहा था ‘मेरी किस्मत अच्छी है तो मैं क्या करूं’ लेकिन आज लगता है नरेंद्र मोदी के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। विपक्षी एकता अलग बात है, पर पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें उनके ताज को टैंक में डूबो सकती हैं। यह आशंका निर्मूल नहीं है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संकेत अवश्य दिए हैं, कि पेट्रोल के दाम घटाने की कोशिश सरकार द्वारा की जाएगी, लेकिन वह कोशिश क्या होगी, यह मंत्री महोदय को भी नहीं मालूम। राज्य सरकारें पहले ही आथिर्क तंगी से जूझ रही हैं। केंद्र से मिलने वाली राशि भी कम हुई है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित प्रदेशों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्रियों ने घोषणाओं के जो अंबार लगा दिए हैं। उन्हें पूरा करने के लिए बजट कहां से आएगा ?

यदि पेट्रोल-डीजल के दाम में कमी करते हुए टैक्स घटाया जाता है, तो योजनाएं अधूरी रह जाएंगी। ऐसी स्थिति में राज्य सरकारें केंद्र की तरफ देख रही हैं। किन्तु प्रधानमंत्री को भी लोकसभा आगामी चुनाव जीतना है, इसलिए उनके विकल्प सीमित हैं।

पेट्रोल और डीजल के दाम में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी, मुंबई में पेट्रोल 84.70 रुपये

मनमोहन सिंह ने तेल के बदले अनाज का रास्ता निकाला था। वर्तमान में अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए जो नए प्रतिबंध लगाए हैं। बराक ओबामा के समय लागू की गई ईरान नीति को लगभग बदल ही दिया है। उससे तेल की राजनीति में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। इसका असर भारत पर होना अवश्यंभावी है। सऊदी अरब और वेनेजुएला में तेल उत्पादन लगातार गिर रहा है। वर्ष 2014 में 1 वर्ष के भीतर क्रूड आयल की कीमत 113 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 50 डॉलर प्रति बैरल आ गई थी। मोदी सरकार ने इस गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं को देने की बजाय सरकार का खजाना भरना ज्यादा उचित समझा। उस समय इसका फायदा भी दिखा, पर अब आगामी चुनावों से पहले अंतर्राष्ट्रीय दामों में लगातार बढ़ोतरी देश के राजकोषीय संतुलन को प्रभावित कर रही है। इसका असर विकास दर पर भी पड़ सकता है। सबसे खराब असर महंगाई पर दिख रहा है। कीमतें नियंत्रण से बाहर हो रही हैं। थोक और खुदरा महंगाई सूचकांक भयावह होते जा रहे हैं। देश के थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित महंगाई दर अप्रैल 2018 में 3.18 फीसदी रही। यह दर मार्च 2018 में 2.47 फीसदी थी। निवेश पर भी असर आ सकता है।

अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले सरकार ने सुधारात्मक उपाय नहीं किए, तो चुनाव में महंगाई एक बड़ा मुद्दा बनेगी। विपक्ष इसे भुनाने की कोशिश भी करेगा। इसका असर घरेलू बचत से लेकर प्रति व्यक्ति आमदनी पर भी पड़ने वाला है। 7 वें वेतन आयोग से लेकर अन्य खर्चे सरकार के सामने पहले से ही मुहं बाएं खड़े हुए हैं। ऐसे में मोदी सरकार की रणनीति क्या होगी यह जानना दिलचस्प है। 2014 में कच्चे तेल की कीमतें 113 डालर से घटकर जब 50 डालर पर आ गई थीं। उस समय स्वयं प्रधानमंत्री ने अपनी किस्मत की सराहना की थी। लेकिन विपक्ष 50 डालर पर कच्चा तेल आने के बाद टेक्स बढाकर जनता को लाभ नहीं देना और अभी 84 डालर प्रति बैरल होने पर भी मनमोहन सरकार की तुलना में पेट्रोल डीजल रिकार्ड महंगा हुआ है। डीजल की सब्सिडी भी नरेन्द्र मोदी सरकार ने खत्म कर दी। डीजल एवं पेट्रोल की कीमतों का अंतर बहुत कम हो गया है। अब विपक्ष इसे नरेन्द्र मोदी की किस्मत से जोड रहा है।

Related Articles

Back to top button
Close