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गर्मी में भी घर को ठण्डा बनाए रखेगा यह आसान सस्ता उपाय !

गर्मी के आगमन के साथ ही एक बार फिर लोगों को को लू के थपेड़ों, झुलसा देने वाली गर्म हवाओं और बिजली की किल्लत का डर सताने लगा है। जिससे आम आदमी की मुश्किल बढ़ गयी है। वहीं शहरीकरण के कारण घरों के अन्दर और बाहर पेड़ जहां पूरी तरह से नदारद हा गए हैं, ऐसे में गर्मी से जूझना और भी मुश्किल हो जाता है।

इस स्थिति में अगर घरों को ठण्डा रखने के कुछ सस्ते उपाय किए जाएं, तो आम आदमी की मुश्किलें काफी हद तक कम हो सकती हैं। इस तकनीक से न केवल शहरों में बने सीमेंट-कांक्रीट के घरों का तापमान कम किया जा सकता है बल्कि ग्लोबल वॉर्मिंग पर भी कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है। दरअसल, सीमेंट-कांक्रीट की छतों से बने घर तेज गर्मी से भट्ठी की तरह तपने लगते हैं। गर्मी के दिनों में इनमें देर रात को भी बैठना मुश्किल हो जाता है।

करे ये आसन से उपाय 

1) सीमेंट-कांक्रीट के ये निर्माण शहरों को हीटआईलैंड यानी ऊष्माद्वीप में तब्दील कर रहे हैं। इसलिए अगर छतों पर ’सफेद पेंट’ या ’चूनायुक्त सफेद सीमेंट’ लेप लगाया जाए तो इसके प्रभाव में 70 से 80 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है। दरअसल सफेद रंग रिफ्लेक्टर यानी परावर्तक का काम करता है। इस तरह गर्मी छत के जरिए घर में तेजी से प्रवेश नहीं कर पाती है। गर्मी के दिनों में दोपहर के समय में छतों द्वारा सोलर विकिरणों को अवशोषित कर लिया जाता है। इससे गहरे रंग की छतें काफी गर्म हो जाती हैं।

2) सामान्य परिस्थितियों में यह तापमान 70 से 80 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। गर्म होती छतों से लगातार उत्सर्जित सोलर विकिरण अधिक समय तक वातावरण में बने रहते हैं, जिससे शहरी क्षेत्र हीटआईलैंड में तब्दील हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रभाव शहर के औसत तापमान पर आ रहा है। भीतरी व बाहरी क्षेत्रों के तापमान में छह से सात डिग्री का अन्तर हो जाता है। जिसमें धीरे-धीरे पर्यावरणीय अस्थिरता के साथ न्यूनतम तापमान भी बढ़ रहा है। इसलिए छतों को गर्म होने से बचाने के लिए सोलर रेडिएशन से बचाव जरूरी है।

3) डार्क रंग रेडिएशन के अधिक भाग को अवशोषित कर लेते हैं। सीमेंट से बने छतों का रंग भी गहरा होता है। यदि छतों को सफेद कर दिया जाए तो सोलर विकिरण परावर्तित होकर वापस स्पेस में चले जाते हैं। इससे वायुमंडल के तापमान पर भी फर्क नहीं होता है। खास बात है कि भवनों का तापमान कम होने से ठंडा करने के उपायों में कम बिजली खर्च होती है, जिससे वातावरण में कार्बन गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आती है।

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