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वर्क फ्रॉम होमः लॉकडाउन में बेहतर समाधान

– डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

कोरोना वायरस की विश्वव्यापी महामारी के चलते जिस तरह से लॉकडाउन और कर्फ्यू का लंबा सिलसिला चला है और समूची दुनिया लगभग थम-सी गई है, उसने काम का जरिया भी बदल कर रख दिया है। अब वर्क फ्रॉम होम का कंस्पेट तेजी पकड़ता जा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि घर से काम करने को आने वाले दिनों में बेहतरीन विकल्प के रूप में देखा जाएगा। अमेरिका और यूरोपीय देशों में वर्क फ्रॉम होम को अपनाया जा चुका है। वहां इसे बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि हमारे देश में यदि कोरोना महामारी के पूर्व की बात करें तो यह अधिक सिरे नहीं चढ़ पाया था पर आने वाले दिनों में वर्क फ्रॉम होम को नियोक्ताओं द्वारा प्राथमिकता दी जाएगी, इसमें संदेह नहीं होना चाहिए।

दरअसल कोरोना महामारी से जिस तरह समूची दुनिया थम-सी गई और जिस तरह से समूचे देश में लॉकडाउन के कारण जो जहां था वहीं रह गया, उससे सबकुछ बंद होकर रह गया। ऐसी स्थिति में सरकारी दफ्तरों और मीडिया हाउस सहित बहुत से क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम को भले ही मजबूरी में पर जिस तरह से अपनाया गया है वह आने वाले दिनों की बदलती कार्यशैली की और साफ संकेत है। हालांकि वर्क फ्रॉम होम का कंस्पेट अमेरिका में 1996 में ही पर्यावरण को देखते हुए कानूनी प्रावधान करके लागू किया गया। स्वच्छ हवा को आधार बनाते हुए अमेरिका की बड़ी कंपनियों को वर्क फ्रॉम होम को अपनाने को कहा गया। अमेरिका की करीब 7 फीसदी कंपनियां अपने कार्मिकों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देती है।

वर्क फ्रॉम होम से जहां बड़े शहरों में यातायात पर अनावश्यक दबाव बढ़ना रुकता है, वहीं पर्यावरण मानकों के अनुसार दुपहिया-चौपहिया वाहनों की रेलमपेल, कार्बन उत्सर्जन में कमी, बड़े शहरों में आंशिक रूप से ही सही धुंध जैसी स्थितियों से राहत, कार्यालयों-कंपनियों में आने-जाने के समय यातायात जाम, पार्किंग समस्या, मानसिक तनाव, कुंठा, कार्यस्थल पर बिजली-पानी की बचत और ना जाने कितने ही लाभ देखकर इसे अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। सबसे खास यह कि व्यक्ति अपने घर से ही बिना किसी मानसिक दबाव के काम करके अच्छे परिणाम दे सकता है। इसके साथ ही अब तो वर्क फ्रॉम होम अधिक सुविधाजनक हो गया है। इस तरह के कई एप और एप्लिकेशन तैयार हो गई है जिससे आसानी से परस्पर समन्वय व संवाद कायम किया जा सकता है। खासतौर से आईटी कंपनियां और कार्यस्थल पर फाइलों में काम करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प है। हालांकि कोरोना लॉकडाउन से पहले के आंकड़ों को देखा जाए तो फ्रीलांसर इनकम अराउंड द वर्ल्ड रिपोर्ट 2018 के अनुसार हमारे देश में करीब डेढ़ करोड़ लोग वर्क फ्रॉम होम से जुड़े हुए हैं। दिल्ली, गुरुग्राम, बैंगलोर, हैदराबाद, मुंबई, चेन्नई आदि की बड़ी कंपनियों द्वारा अपने एम्प्लाईज को यह सुविधा दी जा रही है। खासतौर से प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा इसमें विशेष पहल की गई है।

कोराना वायरस के कारण उत्पन्न स्थितियों और खासतौर से लॉकडाउन के कारण जो हालात बने हैं उन्हें देखते हुए नियोक्ताओं को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। शायद देश ही नहीं दुनिया के इतिहास में यह पहला मौका है जब सबकुछ थम कर रह गया है। ऐसे में सारे काम ठप हो गए हैं और उद्योग-धन्धे तो क्या सामान्य जनजीवन तक बुरी तरह प्रभावित हुआ है। और तो और इसने सामाजिक और मानवीय संबंधों व संवेदनशीलता को भी हिला दिया है। कोरोना वायरस के संक्रमण पर रोक के लिए आइसोलेशन एकमात्र विकल्प माना जा रहा है। यही कारण है कि लोग अपनों की मौत पर अंतिम संस्कार तक में नहीं जा पा रहे हैं। बीमार का समाचार जानने के लिए मिलने जाना तो दूर की बात है। सोशियल डिस्टेंस को अनिवार्य माना जा रहा है। ऐसे में हालात ज्यों-ज्यों सामान्य होने लगेंगे, सरकारी कार्यालयों और व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा वर्क फ्रॉम होम की ओर शिफ्ट किया जाएगा, यह समय की आवश्यकता भी है तो भविष्य का संकेत भी। जो भी काम घर बैठकर किया जा सकता है और जिस काम को वीडियो कॉलिंग, वीडियो कॉन्फ्रेसिंग या टेलीफोनी कॉफ्रेसिंग के माध्यम से निर्देशित किए जा सकते हैं व करवाये जा सकते हैं, उन्हें वर्क फ्रॉम होम की श्रेणी में लाना ही होगा।

कोरोना वायरस ने एक सबक और दे दिया कि थम्ब इंप्रेशन या इस तरह के साधन बेमानी हैं। थंब इंप्रेशन से अटेंडेस पर सबसे पहले रोक लगाई गई क्योंकि यह माना जा रहा है कि इससे कोरोना का संक्रमण अधिक तेजी से विस्तारित हो सकता है। लगभग सभी स्थानोें पर इसपर रोक लगाई गई। इससे यह भी साफ हो गया कि नियतकालीन आने-जाने का अब कोई महत्व नहीं है। अब तो टास्क आधारित वर्कशैली बनानी होगी और इसके भी घर बैठे निष्पादन की प्रकिया तय करनी होगी। जो पैसा कार्यालयों में मीटिंगों व इनके आयोजन से होने वाले चाय-पानी के खर्च हैं और बिजली-पानी में व्यय होता है, उस पैसे में होने वाली बचत से कार्मिकोें को घर बैठे आसानी से काम करने के साधन व एप्लीकेशन उपलब्ध कराने में लगाने से अधिक अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे। मेरी तो यह भी सोच है कि बैंकों की व्यवस्था भी इसी तरह की हो जाती है तो अच्छी पहल होगी।

कोरोना के बढ़ते खतरों को देखते हुए 15 अप्रैल तक का लॉकडाउन 03 मई तक बढ़ गया है। ऐसे मेें मैनेजमेंट को सरकारी-गैर सरकारी थिंक टेंकों को इस दिशा में सोचना आंरभ कर देना चाहिए। क्योंकि यह तो मानकर ही चलना पड़ेगा कि अब वर्क फ्रॉम होम का ही समय आ गया है और देर सबेर इसे अपनाना ही होगा। मजे की बात यह कि इससे पर्यावरण, यातायात, दुर्घटनाएं, मानसिक तनाव, कार्यस्थल पर अनावश्यक खर्चों और न जाने कितनी ही समस्याओं से निजात मिलेगी और परिणाम भी निश्चित रुप से बेहतरीन होंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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