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अमेरिका में हिंसाः दुनिया के दारोगा का दागदार दामन

– डॉ. प्रभात ओझा

पुलिस की गोलियों अथवा लाठीचार्ज के दौरान लोगों की मौत की घटनाएं पहले भी होती रही हैं। ऐसी घटनाओं से गुस्साए लोगों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला भी अनजाना नहीं है। फिर भी अमेरिका में ऐसा कुछ हुआ, जो वहां की ताजा घटनाओं को दूसरी अन्य घटनाओं से अलग करता है। इसे समझना हो तो यह तथ्य काफी है कि पुलिस बर्बरता से जिस जॉर्ज फ्लॉएड नाम के व्यक्ति की मौत हुई, वह अश्वेत था। जार्ज की गर्दन पर वहां की मिनियापोलिस के एक पुलिस अधिकारी ने अपना घुटना रख दिया था। एक मामले में जार्ज को गिरफ्तार करने जब पुलिस पहुंची, उसके साथ नोंकझोंक हुई। जार्ज जमीन पर गिर गया और इसी दौरान पुलिस वाले ने अपने घुटने से उसकी गरदन दबा दी। करीब सात मिनट तक के वॉयरल वीडियो में जार्ज को यह कहते सुना गया-आई कान्ट ब्रीथ (मैं सांस नहीं ले पा रहा)।

इसे पुलिस कार्रवाई में किसी के मारे जाने की सामान्य घटना मानना सही नहीं होता। हुआ भी यही, पर प्रतिक्रिया में जो हुआ, वह और अधिक व्यापक हो गया। लगा अमेरिका एकबार और नस्लीय भेदभाव वाला देश दिखाई दे रहा है। इस भेदभाव के विरुद्ध देश के सौ से भी अधिक शहरों में धरना-प्रदर्शन हुए। हिंसक प्रदर्शनों के चलते तीन दिन बाद तक 25 शहरों में कर्फ्यू चलता रहा। इन शहरों में मिनियापोलिस के अलावा लुईविल, अटलांटा और लॉस एंजिल्स भी शामिल है। फिर मामला इतने तक भी होता तो इसे एक देश का आंतरिक विवाद मानकर चुप हो जाने की स्थिति थी। हिंसक भीड़ के व्हाइट हाउस तक पहुंच जाने की स्थिति में दुनिया के किसी भी हमले से अभेद्य समझे जाने वाले राष्ट्रपति निवास को भी बंकर की मदद लेनी पड़ी। राष्ट्रपति ट्रंप, उनका परिवार और स्टाफ मेंबर ने एक घंटे के लिए ही सही, सुरक्षा के लिए बंकर का सहारा लिया।

माना कि दुनिया के सबसे मजबूत देश के राष्ट्रपति तक पहुंच पाना, उसके अपने देश के नागरिकों तक के लिए आसान नहीं है। फिर कोई अन्य देश तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकता। फिर भी एक ऐसी बात हुई कि अमेरिका दुनियाभर में शर्मसार हुआ है। अभी कोरोना के दौर में इस बात को भले कम करके आंका जा रहा हो, इतिहास ने दर्ज कर लिया है कि सुसभ्य अमेरिका में लंबे समय से चला आ रहा रंगभेद अभी कायम है। तभी संयुक्त राष्ट्र ने भी इस मामले में संज्ञान लेते हुए कहा है कि पुलिस के हाथों सालभर में कई अश्वेत अमेरिकन लोगों की मौत हुई है। एक आंकड़ा सामने आया है कि वर्ष 2015 से लेकर अबतक अमेरिका में पुलिस ने जितने लोगों का एनकाउंटर किया, उनमें मरने वाले अश्वेत लोगों की संख्या श्वेत नागरिकों के मुकाबले तकरीबन दोगुने हैं।

माना कि किसी देश में किसी विशेष समुदाय के लोगों के मारे जाने की एक घटना दुर्योग हो सकती है लेकिन ऐसी घटनाएं बार-बार हों तो चिंता पैदा करेंगी ही। सच यह है कि अमेरिका पुलिस कार्रवाई में अश्वेत लोगों की मौत के मामले में निंदनीय रहा है।

साल 1619 में पहली बार अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों को गुलाम बनाकर लाया गया था। साल 1868 में पहली बार इन अश्वेतों को अमेरिका में नागरिकता मिली। इसके बावजूद 400 वर्षों के बाद भी अमेरिका में नस्लीय भेदभाव इस कदर है कि अश्वेतों की हत्या होती रही है। अमेरिका के आंदोलनों का बड़ा चेहरा रहे मार्टिन लूथर किंग जूनियर, महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे। वे भी गांधी की तरह आंदोलनों में हिंसा की कोई जगह नहीं देखते थे। एकबार अपने एक मशहूर भाषण में उन्होंने यह भी कह डाला कि दंगे वह लोग करते हैं जिनकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाती। ऐसा लगता है कि अमेरिका में अश्वेतों की आज भी नहीं सुनी जा रही है। तभी तो अमेरिका 50 और 60 के दशक में फिर पहुंच गया है।

वर्ष 1965 में लॉस एंजिल्स, 1967 में नेवार्क, 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या के बाद टेनेसी, 1980 में मियामी लिबर्टी और 1992 में अश्वेतों की मौत के बाद लॉस एंजिल्स में हिंसा हुई। इसी तरह वर्तमान शताब्दी में भी 2001 में एक अश्वेत की पुलिस अधिकारी ने हत्या कर दी तो सिनसिनैटी में दंगे भड़के थे। फिर तो अगस्त 2014 में एक निहत्थे अश्वेत किशोर की पुलिस के हाथों मौत के बाद पर्गुसन शहर में दंगे हुए। साल 2015 में वाल्टीमोर में 25 साल के किशोर की गिरफ्तारी और पुलिस वैन में ही ज्यादती के कारण मौत और सितंबर, 2016 में शारलोटो शहर में पुलिस फायरिंग में 43 साल के अश्वेत की मौत के बाद भी दंगे हुए। ये हिंसा और दंगों की घटनाएं, छोटी-बड़ी रहीं। एक बात की समानता रही कि दंगे एक नस्ल विशेष के खिलाफ कार्रवाई से भड़के। ऐसे में विचार करना जरूरी है कि क्या अमेरिका आज भी नस्लभेद के मामले में शीर्ष पर है। कुछ तो है, जिसपर अमेरिका बार-बार परदा डालने की कोशिश करता है।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पत्रिका `यथावत’ के समन्वय सम्पादक हैं।)

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