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महिलाओं और पुरुषों के वेतन में असमानता , वजह, अब भी आवाज नहीं उठा पातीं महिलाएं

नई दिल्ली (ईएमएस)। महिलाएं पुरुषों से कमतर नहीं होतीं। आज ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें महिलाएं पुरुषों के सामान प्रदर्शन नहीं कर रही हैं। ज्यों ही उन्हें आजादी मिली, उन्होंने ऊंची उड़ान भरी। हालांकि महिलाओं की राह अभी उतनी आसान नहीं हुई है, जितनी होनी चाहिए थी। उन्हें जगह-जगह भेदभाव का दंश सहना पड़ता है।

हाल ही में एक सर्वेक्षण ने ऐसे ही भेदभाव से पर्दा उठाया है। इस सर्वे में कहा गया है कि भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में महिलाओं और पुरुषों के वेतन में अंतर होता है। पुरुष और महिलाएं काम एक जैसा करते हैं, जबकि एक जैसा वेतन नहीं पाते हैं। पुरुषों को महिलाओं की तुलना में 20 फीसद वेतन ज्यादा मिलता है। यह कहानी सिर्फ भारत की नहीं है। अमेरिकी संस्था कॉर्न फेरी जेंडर पे इंडेक्स के मुताबिक महिलाओं और पुरुषों के वेतन में यह समानता दुनिया के किसी भी देश में नहीं है। जहां चीन में यह अंतर सात फीसद का है, वहीं अमेरिका में 3.76 फीसद का। जापान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन और पुर्तगाल जैसे देशों में यह अंतर अमेरिका से भी कम है, जबकि रूस, जमैका, ब्राजील जैसे तमाम देशों में भारत से ज्यादा। इस अंतर के लिए दुनिया के तमाम देशों में उनकी परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग कारण जिम्मेदार होंगे, लेकिन हमारे देश में महिलाओं और पुरुषों के वेतन में जो फर्क है, उसकी जड़ें सामाजिक मान्यताओं में ही निहित हैं।

हमारे समाज में महिलाओं के कार्य को सम्मान नहीं दिया जाता, जो महिला कामकाजी न हो यानी कोई नौकरी इत्यादि न करती हो, कभी उससे पूछकर देखिए कि क्या करती हो? वह बहुत संकोच के साथ बताएगी कि वह हाउस वाइफ है, जबकि घर का काम किसी नौकरी से कम नहीं होता। घरेलू महिला की दिनचर्या सुबह चार-पांच बजे प्रारंभ हो जाती है और देर रात 10-11 बजे तक चलती रहती है। लेकिन इसके बदले कोई आमदनी नहीं होती, इसीलिए घरेलू महिला के काम को बहुत सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता। किसान-मजदूर या छोटे-छोटे व्यापारी परिवारों में तो यह भी होता है कि महिलाएं घर का कामकाज निपटाकर बचे हुए समय में पति या अन्य परिजनों का हाथ बंटाने के लिए खेत या दुकान पर चली जाती हैं।

इसके बाद भी महिलाओं को यही सुनने के लिए मिलता है कि तुम करती ही क्या हो? जिस समाज में महिलाओं के कार्य का सम्मान नहीं किया जाता है, उसी समाज के पुरुष वर्चस्ववादी ढांचे के अंदर अगर नौकरीपेशा महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन नहीं मिलता तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यहां एक तथ्य और है। हमारी सामाजिक मान्यताओं की वजह से ज्यादातर महिलाएं दब्बू टाइप की होती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी बचपन से ही यह बात उनके दिमाग में उतार दी जाती है कि उन्हें कम बोलना है। इसके चक्कर में वे अपने अधिकार मांगना भी नहीं सीख पाती हैं। तब स्वाभाविक ही उनके साथ पक्षपात होगा, उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलेगा।

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