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मुंबई के झुग्गीवासियों को मिली सुप्रीम कोर्ट से राहत

नई दिल्ली, 04 जनवरी (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के करीब आठ सौ से अधिक झुग्गीवासियों को राहत देते हुए स्लम रिहैबिलिएशन अथॉरिटी (एआरए) को निर्देश दिया है कि झुग्गियों का विकास करने और उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने के लिए दिशानिर्देश जारी किया है। जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने आज ये दिशा-निर्देश जारी किए।

ये झुग्गीवासी इन जमीनों के खुद मालिक हैं। झुग्गीवासियों ने एक सोसायटी का गठन किया और उसमे बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड से उन जमीनों पर मकान बनाने का करार किया। लेकिन विवाद तब उत्पन्न हुआ जब एक दूसरे बिल्डर जेजी डेवलपर्स ने भी मकान बनाने का दावा ठोका। दरअसल झुग्गीवासियों ने जेजी बिल्डर्स से भी करार कर लिया। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा को ये जानने के लिए नियुक्त किया कि किस बिल्डर के पास सत्तर फीसदी झुग्गीवासियों का सहमति पत्र है। दोनों ही बिल्डर सहमति पत्र नहीं दिखा सके।

कोर्ट ने पाया कि स्लम एक्ट के मुताबिक केवल एसआरए को ही झुग्गियों के विकास और पुनर्वास का अधिकार है| इसलिए कोर्ट ने सहमति पत्र रद्द कर दिया । सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाईकोर्ट के इस फैसले पर भी मुहर लगाई कि झुग्गीवासियों की जमीन खरीदने के लिए बिल्डरों के बीच प्रतियोगिता नहीं होनी चाहिए। जिस बिल्डर को सत्तर फीसदी सहमति पत्र हो वही डेवलप कर सकता है अन्यथा नहीं।

सुप्रीम कोर्ट से एसआरए को आदेश की प्रति मिलने के दो हफ्ते के अंदर बिल्डरों की निविदा आमंत्रित करेगा। उन निविदाओं की जांच-परख करने के बाद ही एसआरए फैसला लेगा कि किस बिल्डर को डेवलप करने का काम सौंपा जाए। बिल्डरों द्वारा काम शुरु करने के बाद एसआरए उनका समय-समय पर मानिटरिंग करेगा।

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