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मुग़लो ने दो बार मंदिर को नष्ट किया, फिर भी जलती रही इस मंदिर की अखंड ज्योति.

Uttar Pradesh.गोरखपुर, 19 मार्च (हि.स.)। योग साधना के लिए एशिया के विभिन्न देशों में जाना जाने वाला गोरक्षपीठ कई बार मुग़ल शासकों के आक्रोश का भंजक बना। मंदिर को तोड़वाकर नष्ट किया गया, लेकिन त्रेता युग से जल रही अखंड धूनी फिर भी जलती रही। इसे कोई बुझा नही पाया। 

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बता दें कि भारत में मुस्लिम शासन के प्रारंभिक चरण में ही इस मंदिर से प्रवाहित यौगिक साधना की लहर समग्र एशिया में फैल रही थी। नाथ संप्रदाय के योग महाज्ञान की किरणों से लोगों को संतृप्त करने के पवित्र कार्य में गोरक्षनाथ मंदिर की भूमिका अग्रणी रही है।

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मंदिर के भीतर के योगी आदित्यनाथ के सहयोगियों में शुमार द्वारिका तिवारी की माने तो विक्रमी उन्नीसवीं शताब्दी के द्वितीय चरण में गोरक्षनाथ मंदिर का अच्छे ढंग से जीर्णोद्धार किया गया। तब से मंदिर के आकार-प्रकार के संवर्धन, समलंकरण व मंदिर से संबन्धित परिसर स्थित मंदिर अनेक विशिष्ट देव स्थानों का जीर्णोद्धार, नवनिर्माण हुआ है। इसमें गोरक्षनाथ मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे महंथों का ख़ास योगदान रहा है।

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उन्होंने बताया कि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके व्यापक प्रसिद्धि के कारण शत्रुओं का ध्यान इधर आकर्षित हुआ।

श्री तिवारी के मुताबिक विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में यह मठ नष्ट किया गया। साधक योगी बलपूर्वक निष्कासित किये गये थे। फिर, मठ का पुनर्निर्माण किया गया और यह पुनः यौगिक संस्कृति का प्रधान केंद्र बना।
उन्होंने बताया कि विक्रमी सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया, परन्तु शिव गोरक्ष द्वारा त्रेतायुग में जलाई गयी अखंड ज्योति आज भी अखंड रूप से जल रही है। इनसे लोगो को आध्यात्मिक, धार्मिक उर्जा मिल रही है।

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