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राजनीति, पुलिस व अपराधियों का गठजोड़ तोड़ना जरूरी

– सियाराम पांडेय ‘शांत’

कानून के हाथ लंबे होते हैं, यह बात एकबार फिर सत्य साबित हुई है। अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो, कानून की गिरफ्त में फंस ही जाता है। 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के मुख्य आरोपी विकास दुबे के साथ भी यही कुछ हुआ। उसे उज्जैन के महाकाल मंदिर से गिरफ्तार कर लिया गया। 2 जुलाई से अबतक उसने 1250 किमी की यात्रा की और उप्र, हरियाणा और मप्र पुलिस को उसकी भनक तक नहीं लगी। उसे पकड़ा भी तो महाकाल मंदिर के गार्ड ने। गिरफ्तारी का श्रेय भले ही मध्य प्रदेश पुलिस ले लेकिन माना यह जा रहा है कि यह विकास दुबे का सुनियोजित आत्मसमर्पण था। पुलिस की तमाम मुस्तैदी के बाद भी वह अगर यत्र-तत्र घूमता रहा तो यह किसी विशेष संरक्षण के बिना संभव नहीं था। यह और बात है कि विकास दुबे को पुलिस से दुश्मनी महंगी पड़ी। उसके कई साथी और रिश्तेदार पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। उसकी मां कह रही है कि महाकाल ने उसके बेटे को बचा लिया लेकिन उन माताओं का क्या जिनके बेटे विकास के वहशीपन के चलते इस दुनिया में नहीं रहे।

इसमें शक नहीं कि कानपुर देहात जिले के चौबेपुर थाना क्षेत्र के बिकरू गांव में दबिश देने गई पुलिस पर हमले में क्षेत्राधिकारी समेत 8 पुलिसकर्मियों की मौत ने शासन-प्रशासन की पेशानियों पर बल ला दिया है। इससे यूपी पुलिस की साख प्रभावित हुई है। माफिया विकास दुबे और उसके गुर्गों द्वारा किए गए हमले में 5 पुलिसकर्मी, एक होमगार्ड और एक नागरिक भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं जिनका अस्पताल में इलाज चल रहा है। हत्या जैसे कई संगीन मामले दर्ज होने के बाद भी जो जिले के टॉप टेन अपराधियों की लिस्ट में नहीं था, उसका अचानक प्रदेश के टॉप 3 अपराधियों में आ जाना विस्मय पैदा करता है। वैसे जिस तरह जांच आगे बढ़ रही है, कुछ उसी तरह के चौंकाने वाले खुलासे भी हो रहे हैं। पुलिस-माफिया और राजनीति के मजबूत गठजोड़ का भी पता चल रहा है। विकास की मां सरला दुबे के बयान तो यही बताते हैं कि नेतानगरी ने उनके बेटे को अपराधी बना दिया वर्ना वह भी सामान्य इंसान की तरह जीवन-बसर कर रहा होता। उनका मानना है कि अगर वह अपराधी था तो 15 साल मायावती, 5 साल भाजपा और 5 साल सपा ने उसे अपने दल से क्यों जोड़े रखा? सवाल में दम है लेकिन ऐसा कहकर वे अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकतीं। यह सवाल तो बनता ही है कि बतौर मां संस्कार के नाम पर उन्होंने अपने बेटे को क्या दिया?

सच तो यह है कि कोई भी दल इस मामले ने खुद को दूध का धुला कह पाने की स्थिति में नहीं है। अगर वोहरा कमेटी की रिपोर्ट और उसमें जाहिर राय पर अमल किया गया होता तो आज तस्वीर का रुख कुछ और होता। पुलिस, माफिया और राजनीति का गठजोड़ मजबूत न होता। विकास दुबे का जिस तरह का साम्राज्य था, वह पुलिस की मदद के बिना संभव नहीं था। अगर सीओ देवेंद्र मिश्र की शिकायतों पर ध्यान दिया गया होता तो 8 पुलिसकर्मियों के मारे जाने की नौबत नहीं आती। इन 8 मौतों का जिम्मेदार जितना विकास दुबे है, उससे अधिक भ्रष्ट तंत्र भी है जो पर्दे के पीछे खड़ा रहकर उसकी मदद करती रही। घटना के बाद जिस तरह की तत्परता पुलिस ने दिखाई है, वैसी पहले दिखाती तो उसका माफिया तंत्र इतना विकसित नहीं हो पाता। दरअसल पुलिस सक्रिय ही तब होती है जब कोई बड़ी घटना हो जाती है। अन्यथा उसका ढर्रा वही पुराना रहता है।

विकास दुबे पर जब राज्यमंत्री की हत्या, स्कूल प्रबंधक की हत्या या व्यवसायी की हत्या का आरोप लगा, पुलिस उसी वक्त कानूनी शिकंजा कसती तो क्या बात होती। पुलिस ने उसका बिकरू गांव का घर न केवल ढहाया बल्कि उसके पांच साथियों को भी हिरासत में लिया है, इसमें दो महिलाएं भी शामिल हैं। उसका एक राजदार जय वाजपेयी तो केवल चार हजार की नौकरी करता था और देखते ही देखते अरबों रुपये में खेलने लगा। विकास दुबे के मददगार चौबेपुर थानाध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया है तो पूरे चौबेपुर थाने के पुलिसकर्मियों की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए लाइन हाजिर कर दिया गया है। पूर्व एसएसपी अनंत देव तिवारी की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए उन्हें एसटीएफ के डीआईजी पद से हटा दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना वाले ही दिन अधिकारियों को कहा था कि एक सप्ताह में अपराधियों को वहां दिखना चाहिए जहां उनकी वास्तविक जगह है। मुख्यमंत्री पहले भी कह चुके हैं कि अपराधी की जगह या तो जेल में है या यमलोक में। कहना न होगा कि योगी राज्य में बहुत सारे अपराधी मारे भी गए हैं लेकिन यह भी बड़ा सच है कि पुलिस और राजनीतिक दलों की पनाह में हर जिले में विकास दुबे जैसे अपराधी पल और बढ़ रहे हैं। 40 थानों की पुलिस, दस हजार जवान और पुलिस की सौ टीमें अगर घटना के छह दिनों तक विकास दुबे को पकड़ नहीं पाईं तो इसका मतलब साफ है कि उसे कहीं न कहीं पुलिस की मदद मिल रही थी। या पुलिस पर किसी बड़े नेता का दबाव था। दबिश देने गए पुलिस दल पर माफिया के हमले की यह पहली और अंतिम घटना नहीं है। इस प्रदेश में श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे अपराधी भी रहे हैं जिसने मुख्यमन्त्री तक की हत्या की सुपारी ले रखी थी।

अपराधियों, पुलिस अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ को तोड़े बिना समाज में अमन चैन संभव नहीं है। मुख्यमंत्री को इसे तोड़ने के लिए व्यक्तिगत तौर पर सक्रिय होना पड़ेगा। व्यवस्था की हर कमजोर कड़ी को दुरुस्त करना होगा। आस्तीन के नागों के फन कुचलने होंगे। यही वह तरीका है जिससे भ्रष्टाचार और अपराध पर जीरो टॉलरेंस की नीति को आगे बढ़ाया जा सकता है। अगर योगी आदित्यनाथ जैसा ईमानदार मुख्यमंत्री इस जड़ता को नहीं तोड़ पाया तो यह इस प्रदेश का दुर्भाग्य ही होगा।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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