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गर्व है हम पाश्चात्य जगत का ‘नेशन’ नहीं : डॉ. कृष्ण गोपाल

 नई दिल्ली, 01 अक्टूबर (हि.स.)। पाश्चात्य जगत के ‘नेशन’ की अवधारणा को असहिष्णुता से प्रेरित करार देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने कहा कि भारत का राष्ट्रीय दर्शन सकल भुवन जनहिताय केंद्रित है। कृष्णगोपाल ने कहा कि अंग्रेज विद्वानों ने भारत को नेशन नहीं माना और भारतीयों के मन में पहचान का भ्रम पैदा किया लेकिन हमें इस बात पर गर्व है कि हम पाश्चात्य जगत का नेशन नहीं हैं। 

जनकल्याण शिक्षा समिति द्वारा सिविल सेवा की तैयारी के लिए संचालित प्रकल्प ‘संकल्प’ की त्रिदिवसीय व्याख्यानमाला के पहले दिन रविवार को राष्ट्र की भारतीय अवधारणा विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में डॉ. कृष्णगोपाल ने कहा कि भारत की राष्ट्र अवधारणा में केवल अपने सुख और कल्याण की नहीं बल्कि विश्व के कल्याण की कामना की जाती है जबकि पश्चिम का नेशन एक समूह विशेष को केवल अपने हितों के लिए बर्बरता व संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि हमें इस बात पर गर्व है कि हम पाश्चात्य जगत का नेशन नहीं हैं। इतना ही नहीं हम भविष्य में भी ऐसा नेशन नहीं होना चाहते। ईश्वर न करे भारत उस नेशनलिटी की ओर आगे बढ़े जिसका दुष्परिणाम सारा विश्व भुगत चुका है। 

कृष्णगोपाल ने कहा कि हमारा राष्ट्र दर्शन किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है। हमारी राष्ट्र दर्शन से उत्पन्न संस्कृति अर्थात उस राष्ट्र दर्शन को जीवन के प्रत्येक भाग के व्यवहार में लाने का जो कार्य है ये संस्कृति है। ये दर्शन हमारे लेखन, भोजन, परिवार, नृत्य,गीत संगीत और जीवन के प्रत्येक भाग में प्रकट हो इसे संस्कृति कहते हैं। उन्होंने भारतीय दर्शन की विशेषताएं बताते हुए कि पहला, एक व्यक्ति के द्वारा प्रारम्भ किया गया यह विचार दर्शन नहीं है। दूसरा, ये किसी ग्रंथ के द्वारा निर्देशित नहीं होता है। तीसरा, भारत की संस्कृति, दर्शन और विचार ये भिन्न नहीं हैं ये अविछिन्न हैं। चार, हमने समन्वय के मार्ग को कभी बंद नहीं किया। समन्वय को बहुत महत्व दिया। पांच, हमारी सीमाएं असीम हैं। हम किसी भी सीमा तक जाकर समन्वय करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि उसके अंदर भी ईश्वर का वास है। इसलिए हमारी समन्वय की सीमाएं बहुत विस्तीर्ण हैं। हमारा सारा दर्शन मोक्ष और साधना की स्वतंत्रता देता है। 

उन्होंने कहा कि हिन्दुओं ने भारत के दर्शन में किसी भी कठिनाई में अपने मौलिक तत्व को नहीं छोड़ा। ये मौलिक तत्व ही भारत का राष्ट्र दर्शन है जो पाश्चात्य जगत के नेशनहुड, नेशनेलिटी और नेशन कंसेप्ट से बहुत दूर है। हमें इस बात का गर्व है कि हम पाश्चात्य जगत का नेशन नहीं हैं। 

कृष्णगोपाल ने कहा कि हम हिन्दू नहीं अगर हम केवल हिन्दुओं की सोचते हैं। हमारा अपना सोचना सिर्फ अपनी ही भलाई नहीं हम संपूर्ण मनावजाति की भलाई चाहते हैं। हमारे भीतर विभिन्नता है और हम चाहते हैं कि विभिन्नता रहे और जिसको जैसा अच्छा लगता है वह उस प्रकार से रहे। लेकिन उसमें भी एकता है। उसमें भी परमात्मा की एकता है। आत्मा की एकता है। एक-दूसरे को अच्छी तरह से देखने की एकता है। हम सभी की भलाई चाहते हैं। इसी के अंदर हमारा एक ज्ञान है हम लड़ाई नहीं चाहते लेकिन हम ताकतवर होना चाहते हैं। क्योंकि बिना ताकतवर हुए हमें बहुत नुकसान हुआ है। शक्ति हमें अवश्य चाहिए| इसलिए जहां हम सारे संसार की भलाई चाहते हैं| इसलिए हमारे पास शाक्ति भी होनी चाहिए। 

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