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पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति को पिशाचमोचन कुण्ड पर त्रिपिंडिक श्राद्ध, जल तर्पण

वाराणसी,06 सितम्बर : काशी पुराधिपति की नगरी काशी को मोक्ष की नगरी का द्वार (काश्यां मरणाम मुक्ति)भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले हर इन्सान को भगवन शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं। ऐसे लोग जो काशी या बाहर देश के अन्य हिस्सों सात समन्दर पार भी अकाल मौत का ग्रास बनते हैं। उनके मोक्ष की प्राप्ति भी पितृपक्ष में काशी के पिशाच मोचन (विमल) कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध से होती है। यहां त्रिपिंडिक श्राद्ध से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु के चलते भटक रही आत्मा को मुक्ति मिल जाती है।

पितृपक्ष के पहले दिन विमल कुंड पर दर्जनों परिवार अपने परिजनों के मुक्ति के लिए त्रिपिंडिक श्राद्ध कराते रहे। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मिट्टी के तीन कलश की स्थापना कर उस पर काले, लाल और सफ़ेद झंडे लगा श्राद्ध कर्म होता रहा। इस दौरान परिजन यहां स्थित पीपल के पेड़ में सिक्के भी लगाते रहे। इसमें लोग मृतक लोगों की फ़ोटो भी लगाते रहे। माना जाता है कि ऐसा करने से पितरों की आत्मा भटकती नहीं है। पिण्डदान के दौरान श्रद्धालु अपने कुल गोत्र, नाम, राशि और पितर का नाम तथा संबंध का उल्लेख कर हाथ में जल लेकर संकल्प लेते रहे और पूर्वाभिमुख होकर कुश, चावल, जौ, तुलसी के पत्ते और सफेद पुष्प को श्राद्धकर्म में अर्पित किया। तिल मिश्रित जल की तीन अंजुली जल तर्पण में अर्पित किया। पिंडदान के बाद गाय, कुत्ता, कौवा को पितरों के प्रिय व्यंजन का भोग लगा ब्राह्मणों, बटुकों को खिलाकर उन्हें दक्षिणा और उपहार देकर विदा किया। इस सम्बन्ध में कर्मकांडी प्रदीप पाण्डेय ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि अगर किसी के परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है।

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इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है। जिनके परिजनों की अकाल मृत्यु हुई है या जिनके परिजनों की मौत दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई है। उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है। जिनकों अपने पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है। उन्होंने बताया कि पितरों के श्राद्धकर्म न करने से सात जन्मों का पुण्य नष्ट हो जाता है और देवताओं के क्रोधित हो जाने से तीन जन्मों का पुण्य नष्ट हो जाता है। 

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