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पर्यावरण के प्रति सचेत होने का वक्त

पर्यावरण दिवस 05 जून पर विशेष

– डा. रमेश ठाकुर

उपभोक्तावादी संस्कृति ने पर्यावरण का क्या हाल कर दिया है, बताने की जरूरत नहीं। गनीमत कहो लाॅकडाउन की जिसने कराहते पर्यावरण को एकबार फिर संजीवनी दे दी है। आकाश में जहां धुंध के गुबार दिखते थे, वहां आकाश एकदम साफ दिखाई देने लगा है। नदी, तालाब, नाले सभी शीशे की भांति चमक रहे हैं। दूर-दूर दूषित पर्यावरण, पाॅल्यूशन का नाम तक नहीं। बादल नीले दिखते हैं, बारिश के बाद इंद्रधनुष का दीदार होने लगा है। परिंदे खुशी से चहकने लगे हैं। घर-आंगन में उनकी चहलकदमी अनायास बढ़ गई है। सालों से तमाम पर्यावरणविद् हुकूमतों से यही कहते आए थे कि मोटर वाहनों और अतिक्रमण से पर्यावरण दूषित हो रहा है, इसे रोका जाए। पर, हूकुमतें उनके तर्क को नकारती रहीं। सरकारों का तर्क रहता था कि पर्यावरण के दूषित होने का कारण ये नहीं बल्कि बदलता नेचर सिस्टम है। लेकिन इस वक्त उनको शायद पता चल गया होगा कि मानवीय हिमाकतें ही पर्यावरण का गला घोंट रही थीं?

दूषित पर्यावरण को लेकर सरकारों को वजहें पता होती हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां बिना किसी भय के धरती का सीना चीरकर गंगनचुंभी ईमारतों का निमार्ण करती हैं। उनके समक्ष पर्यावरण को बचाने वाले तमाम कानून बौने हो जाते हैं। पानी का स्तर तेज गति से नीचे समा रहा है। हाल की कुछ रिपोर्ट्स पर गौर करें तो समूचे संसार की करीब एक चौथाई जमीन बंजर हो चुकी है और यही रफ्तार रही तो सूखा प्रभावित क्षेत्र की करीब 70 प्रतिशत जमीन कुछ ही समय में बंजर हो जायेगी। करीब अस्सी देश ऐसे हैं जो भयंकर सूखे की चपेट में हैं, जिनमें भारत का नाम भी शामिल है। महाराष्ट्र व बुंदेलखंड मंडल के कुछ क्षेत्र बीते कई वर्षों से बेपानी हो गए हैं। पर्यावरण को दुरुस्त करने को लेकर फिलहाल केंद्र सरकार कुछ कार्ययोजनाओं पर काम कर रही है। पर स्थिति पर इतनी जल्दी सफलता पाना मुमकिन नहीं। कई दशकों से समस्या पर अंकुश लगाने के लिए कागजी प्रयासों और गाल बजाने की कोई कमी नहीं हुई लेकिन जमीन पर सब शून्य। बड़े-बड़े कल-कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला विषैला धुआं, रेलगाड़ी व अन्य मोटर वाहनों के पाइपों और इंजनों से निकलने वाली गैसें, रसायनों की गंध व कचड़ा, अवशिष्ट रासायनिक पानी, परमाणु भट्ठियों से निकलने वाले जहरीले तत्व से वायु तथा जल प्रदूषित हो रहा है।

प्रकृति ने पृथ्वी पर जीवन के लिये प्रत्येक जीव के सुविधानुसार उपभोग संरचना का निर्माण किया है। परन्तु मनुष्य ऐसा समझता है कि इस पृथ्वी पर जो भी पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, नदी, पर्वत व समुद्र आदि हैं, वे सब उसके उपभोग के लिये हैं और वह पृथ्वी का मनमाना शोषण कर सकता है। यद्यपि इस महत्वाकांक्षा ने मनुष्य को एक ओर उन्नत और समृद्ध बनाया है तो दूसरी ओर दुष्परिणाम भी प्रदान किये हैं, जो आज विकराल रूप धारण कर हमारे सामने खड़े हैं। वर्षाजल के भूमि में न समाने से जलस्रोत सूख रहे हैं। नतीजतन, सैकड़ों की संख्या में गांवों को पेयजल किल्लत से जूझना पड़ रहा तो सिंचाई के अभाव में हर साल परती भूमि का रकबा बढ़ रहा है। नमी के अभाव में जंगलों में हर साल बड़े पैमाने पर लगने वाली आग से वन संपदा तबाह हो रही है।

जल ही जीवन है और इसके बगैर जिंदगी संभव नहीं लेकिन इसके अथाह दोहन ने कई तरह से पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। कुछ साल पहले कई विशाल जलाशय बनाए गए थे। इनको सिंचाई, विद्युत और पेयजल की सुविधा के लिए हजारों एकड़ वन और सैंकड़ों बस्तियों को उजाड़कर बनाया गया था, मगर वे भी अब दम तोड़ रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग ने इन तालाबों में जल उपलब्धता के जो ताजा आंकड़े दिए हैं, उनसे साफ जाहिर होता है कि आने वाले समय में पानी और बिजली की भयावह स्थिति सामने आने वाली है। इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि जल आपूर्ति विशालकाय जलाशयों (बांध) की बजाए जल प्रबंधन के लघु और पारंपरिक उपायों से ही संभव है, न कि जंगल और बस्तियां उजाड़कर। बड़े बांधों के अस्तित्व में आने से जल के अक्षय स्रोत को एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित रखने वाली नदियों का वर्चस्व खतरे में पड़ गया है।

समूचे देश के 76 विशाल और प्रमुख जलाशयों की जल भंडारण की स्थिति पर निगरानी रखने वाले केंद्रीय जल आयोग द्वारा कुछ वर्ष पहले तालाबों की जल क्षमता के जो आंकड़े दिए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। पर्यावरण की समुचित सुरक्षा के अभाव में विकास की क्षति होती है। इस क्षति के कई कारण हैं। यांत्रिकीकरण के फलस्वरुप कल-कारखानों का विकास हुआ। उनसे निकलने वाले उत्पादों से पर्यावरण का निरंतर पतन हो रहा है। कारखानों से निकलने वाले धुएं से कार्बन मोनो ऑक्साइड और कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसें वायु में प्रदूषण फैला रही हैं, जिससे आंखों में जलन, जुकाम, दमा तथा क्षयरोग आदि हो सकते हैं। वर्तमान में भारत की जनसंख्या लगभग डेढ़ अरब से ऊपर तथा विश्व की साढ़े सात अरब से अधिक पहुंच गई है, इस विस्तार के कारण वनों का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है। पिछले दो दशकों के अंतराल में लगभग 24 करोड़ एकड़ वनक्षेत्र समाप्त हो गया है। नाभिकीय विस्फोटों से उत्पन्न रेडियोएक्टिव पदार्थों से पर्यावरण दूषित होने से अस्थि कैंसर, थायरॉइड कैंसर, त्वचा कैंसर जैसी घातक बीमारियां जन्म लेने लगी हैं। स्पष्ट है कि पर्यावरण संबन्धी अनेक मुददे आज विश्व की चिन्ता का विषय हैं। विश्व पर्यावरण दिवस को महज रस्म अदायगी के तौर नहीं लेना चाहिए, मंथन की जरूरत है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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