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पारिवारिक रिश्ते और सियासत में अखिलेश की फतह.

नाम और सियासत की परिवारिक जंग में अन्ततः अखिलेश यादव को फतह मिली। चुनाव आयोग के ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया वैसे यह अप्रत्याशित नहीं लग रहा था। एक तो दस्तावेज के आधार पर अखिलेश खेमे का दावा बहुत था दूसरे सियासी मौसम के जानकाराें का व्यवहार भी ऐसे ही फैसले की ओर इशारा कर रहा था। अपने को मुलायमवादी घोषित करने वाले चर्चित नेता फैसला आने के पहले लंदन रवाना हो गए। चलते-चलते यह भी बता गए कि वह मार्च तक विदेश में रहेंगे। जबकि कुछ दिन से वह अपने मुलायमवादी होने का फर्ज बड़ी सक्रियता से निभा रहे है। इसी प्रकार प्रायः प्रत्येक विधान सभा चुनाव में पाला बदलने को मशहुर एक नेता बड़ी मुस्तैदी से अखिलेश खेमे में जमे थे। उनकी गिनती इस खेमें के रणनीति कारो में हो रही थी। ऐसे कतिपय नेताओं के फैसला पूर्व व्यवहार से यह तय करता है कि मुलायम बाजी हारने वाले है।

समाजवादी पार्टी के इस प्रकरण ने कई दिलचस्प तथ्य भी उजागर किया है अभी तक चुनावी राजनिति में परिवाद का रिकार्ड मुलायम के नाम था। एक साथ किसी परिवार के एक साथ इतने लोग विभिन्न पदो पर नही थे। रिकार्ड के बाद विडम्बना देखिये उसी परिवारवाद ने मुलायम सिंह को कहीं का नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी राजनीति राम मनोेहर लोहिया के सानिध्य में शुरु की थी। उस समय लोहिया राजनिति में वंश परंपरा का मुखर विरोध कर रहे थे। उनका यह विचार समाजवाद के सिद्धांतो में शामिल हो गया। इसके बाद अनेक समाजवादी नेता हुए जिन्होंने अपने परिवार के सदस्यों की राजनिति में आने से रोक दिया। मुलायम सिंह यादव ने दशकों तक ऐसे ही समाजवादियों के साथ कार्य किया। लेकिन जब समाजवाद में मुलायम का दौर आया तो मान्यताएं सिद्धान्त बदल गए। उन्होंने परिवारवाद के लिए सभी दरवाजे खोल दिए। ब्लाॅक प्रमुख सेल लेकर देश की सर्वोच्च पंचायत तक जहां संभव हुआ।

परिवार के सदस्यों को तरजीह दी गई। पिछले लोकसभा चुनाव में तो समाजवाद का बिल्कुल नया स्वरुप व रंग दिखाई दिया। राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादियों ने कभी समाजवाद की कल्पना तक नहीं की होगी। लोकसभा में मुलायम सिंह सहित पांच सदस्य पहुंचे। ये सभी उनके परिजन थे। कई बार मुलायम ने इस बात पर क्षोभ भी व्यक्त किया। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार भी वहीं थे। जो क्षेत्र सपा के गढ़ माने जाते है। वहां चुनाव लड़ाने के लिए क्या कोई समाजवादी नहीं मिला। तब पुत्र वधु- भतीजे ही नही पौत्र को चुनाव लड़ाया गया। ये सभी विजयी हुए। यदि खाटी व संघर्षशील समाजवादियों को तरजीह दी जाती है। तो शायद कुछ लोग आज भी मुलायम के साथ होते। लेकिन जो परिजन उनकी कृपा से सांसद बने,उन्होंने भी साथ छोड़ दिया। राज्यसभा में भी नेता पद देने के लिए मुलायम ने अपने ही एक भाई पर विश्वास किया फिर विडम्बना देखिए, इन्ही ने समाजवादी पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया। इन्ही ने मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन्ही ने चुनाव पार्टी के नाम व निशान हेतु दस्तावेज,हलफनाओं का अंबार लगा दिया।

जाहिर है यह मुलायम के लिए आत्म चिंतन का विषय होना चाहिए। उन्होंने अपने समाजवादी चिंतन में जिस प्रकार परिवारवाद को इस हद तक तरजीह दी। उसको ऐसे ही अंजाम तक पहुंचना ही था। यह भी नहीं समझना चाहिए कि परिवाद विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया। किसकी महत्वकांक्षा कब तक शांत रहेगी। यह कहा नही जा सकता है। मुलायम सिंह यादव को एक अन्य संबंधित विषय पर आत्मचिंतन करना चाहिये। उन्होंने विधान सभा चुनाव के पहले ही अखिलेश यादव को बतौर उत्तराधिकारी पेश किया था। बहुमत मिलने के बाद उन्होंने अपने पुत्र को न केवल मुख्यमंत्री बनाया वर्न प्रदेश अध्यक्ष की कमान भी सौंप दी। एक प्रदेश अध्यक्ष तक सीमित क्षेत्रीय दल में प्रदेश अध्यक्ष का महत्व होता है। खास तौर पर जब पार्टी परिवार अधारित हो और प्रदेश अध्यक्ष मुखिया का पुत्र तो कहना क्या। इस प्रकार सरकार व संगठन दोनाें मुलायम ने उत्तराधिकारी सौंप चुके थे।

उत्तराधिकार सौंपने के बाद एक मर्यादा का पालन करना होता है। एक सीमा से अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। लेकिन मुलायम का परिवारवाद इस उत्तराधिकार तक सीमित नहीं था। वह मोह से मुक्त नहीं होना चाहते थे। इसलिए उत्तराधिकारी भी आधा-अधूरा ही रहा। मंत्री परिषद निर्माण मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है। क्या मुलायम ने ऐसा होने दिया। इसी प्रकार मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिवों की तैनाती उन्हीं का विशेषाधिकार होता है। क्या मुलायम ने इसमे भी हद से बढ़कर हस्तक्षेप नहीं किया। क्या कुछ खराब छवि वाले मंत्रियों को मुलायम का वरदहस्त प्राप्त नहीं था।

परिवार आधारित अन्य दलों की भांति मुलायम ने केवल अखिलेश को आगे किया होता, तो आज इन्हे इस अप्रिय स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। तब वह राजनितिक उत्तराधिकारी आसानी से सौंप देते सकते थे। लेकिन मुलायम अन्य परिजनों के प्रति भी राजनीतिक रुप से उदार बने रहे। इससे टकराव की भूमिका तो बन ही रही थी।

इसी प्रकार अखिलेश को भी अपने पूरे कार्यकाल के बारे में आत्मचिंतन करना चाहिये। क्या मुलायम सिंह की आधे-अधूरी विरासत को साढ़े चार वर्षाें तक अखिलेश ने सहजता से स्वीकार नही कर लिया था। क्या वह इस व्यवस्था में उन्होंने अपने को पूरी तरह ढाल नहीं लिया था। आरोपों से घिरे एक चर्चित मंत्री को हटाने का फैसला कब लिया गया। इन मंत्री को हटाने का फैसला लिया गया। इन मंत्री को हटाने या कौमी एकता दल के विलय वाला प्रकरण परिवार में तनाव बढने के बाद ही सामने क्यो आया। इस समय तक दोनों खेमें एक-दूसरे को मात देने की चाल चल रहे है। क्या यही सही नहीं कि शुरुआत में ही मुख्यमंत्री ने एक दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री के कहने पर महिला आईएएस को निलंबित किया था। बाद में जो प्रकरण आया वह नियमानुसार व ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों को हत्तोत्साहित करने वाला था। जब कोई शासक जाने-अनजाने इस प्रकार संदेश देता है तो अच्छे प्राशसनिक आधिकारियों का मनोबल गिरता है।

एक बार ऐसी छवि बन जाती है, तब उससे छुटकारा आसान नहीं होता। इसी प्रकार कानून व्यवस्था व जाति वाद के आरोप इस सरकार लगे। क्या समय रहते सरकार को इस छवि से मुक्त कराने के कारगर प्रयास किए गये। प्रायः सत्तापक्ष अपनी वाह-वाही में अन्य सरकारों से कार्यकाल आधार पर तुलना करते है। बतौर प्रधानमंत्री चन्दशेखर ने चार महीने बनाम 40 वर्ष नारा दिया था। ऐसे अनेक उदाहरण है लेकिन यहां अखिलेश सरकार के साढ़े चार वर्ष व चार महीने अलग-अलग दिखाई देते है। साढ़े चार वर्ष उन्होंने संगठन व सरकार से संबंधित आन्तरिक या पारिवारिक व्यवस्था को सहजता से स्वीकार किया है। शेष चार महीनों में उनके तेवर अलग थे। इसका कितना लाभ मिलेगा यह तो चुनाव बाद दिखाई देगा।
                                                            डा. दिलीप अग्निहोत्री (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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