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विश्वप्रसिध्द ऐतिहासिक मेले का हुआ शुभारंभ.

मोरीगांव, 19 जनवरी=  मध्य असम के मोरीगांव जिले के जागीरोड से 3 किमी की दूरी पर स्थित विनिमय प्रथा पर आधारित तीन दिवसीय गोभा राजा का ऐतिहासिक जोनबिल मेला गुरुवार से आरंभ हो गया। मेले के उद्घाटन गोभा राजा के दरबार बैठने के साथ हुआ। गोभा राजा ने पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना की उसके बाद मेले का औपचारिक उद्घाटन हो गया। तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में सामानों की खरीददार के लिए किसी भी तरह के मुद्रा का व्यवहार नहीं होगा। सामान के बदले सामान की खरीददारी और बिक्री होती है।

यह मेला 15वीं सदी के बाजार व्यवस्था की याद को ताजा करता है। बाहर से आने वाले इस मेले में खरीददारी की व्यवस्था को देख हैरान हो जाते हैं, कि अगर मुद्र नहीं होगा तो खरीददारी कैसे संभव हो सकती है, इस व्यवस्था का यह मेला एक जीवंत उदाहरण है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मेले का पहली बार आयोजन आहोम राजाओं ने किया था। उन्होंने इस मेले के जरिए जनजातिय नेताओं के साथ राजनीतिक दूरियों को समाप्त करना था। जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए थे, ऐसा कहा जाता है। तब से यह मेला प्रत्येक वर्ष आयोजित होता आ रहा है।

मेले में हिस्सा लेने के लिए हजारों की संख्या में कार्बी, खासी, तिवा और जयंतिया जनजातियों के पहाड़ों में निवास करने वाले महिला-पुरुष पहुंचे हैं। यह मेला जनजातियों और मैदानी इलाकों के बीच आपसी भाईचारे को मजबूत करने में काफी सहायक सिद्ध होता है। जोनबिल मेला पानी के प्राकृतिक स्रोत जोनबिल झील के किनारे आयोजित होता है। मेले में तीनों दिन गोभा राजा के वंशजों के द्वारा राज दरबार बैठता है। जिसमें राजा का पूरा मंत्रिमंडल सांकेतिक राज दरबार की झलक प्रस्तुत करता है। इस दौरान राजा अपनी प्रजा से कर भी वसूलते हैं। मेले में पारंपरिक नृत्य, संगीत, गीत का आयोजन होता है, साथ ही मेले का शुभारंभ जोनबिल (झील) में सामूहिक मछली पकड़ने के साथ होता है। आज हजारों की संख्या में लोगों ने जोनबिल में मछली पकड़कर अपनी परंपरा का पालन किया।

मेले में कोई भी सामान खरीदने के लिए बदले में उसी मूल्य का दूसरा सामान देना होता है। इस मेले को देखने के लिए राज्य ही नहीं देश-विदेश से काफी संख्या में पर्यटक यहां पर आते हैं। इस वर्ष सरकार भी इस मेले को आकर्षक व देसी-विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए काफी तैयारियां की हैं।

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गोभा देउराजा जोनबिल मेला तिवा व लालुंग परंपरा के अनुसार तीन दिनों तक चलता है। मेले में कार्बी आंग्लांग, मेघालय के पहाड़ों पर उत्पादित विभिन्न खाद्य सामग्रियों की अदला-बदली हेतु पहाड़ से मामा-मामी (पहाड़ों पर निवास करने वाले पुरुष और महिलाओं को माम-मामी कह कर संबोधित किया जाता है) मेले में पहुंचे हैं। पहाड़-मैदानी समन्वय के प्रतीक इस ऐतिहासिक मेले में अदरक, धुना, गंधक, पहाड़ी मिर्च, कचु व अरुई समेत अन्य सामान लेकर बीते बुधवार को ही लोग मेला परिसर में पहुंच गए थे। मैदानी इलाकों के लोग अपने उत्पाद जैसे बोरा चावल, तिल, पीठा, जोहा चावल, सुखी मछली आदि की पहाड़ी लोगों से अदला-बदली कर रहे हैं। स्थानीय लोग इस मेले में बड़े ही उत्साह के साथ हिस्सा ले रहे हैं।

मेला परिसर में घास-फुस से अस्थायी डेरा बनाकर पहाड़ों से आए लोग यहीं पर रात गुजारेंगे। तीन दिनों तक चलने वाले जोनबिल मेला में एक अनोखी दुनिया से यहां पहुंचने वालों का साक्षात्कार होगा। जो वर्तमान समय में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।

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